There are no advertisements in the Ranchi yet
  • Zindgi me ki gai ek galti insan ko kaha se kaha paucha deti hai ek choti si galti ke keran mai aaj tak pachta raha hu mai aap aap logo se yahi kahunga ka jivane koi v faisla soch samaj kar le nah8 puri Zindagi pachtani paregi🥺
0
1

Simplicity is the key of happiness

हमेशा मुस्कुराते रहो भाइयों और सज्जनों क्योंकि ज़िन्दगी बहुत अनमोल है|बाद में बहुत पछताओगे

खुदा ना खास्ता कुछ हो जाए तो बहुत रोओगे सिर पिटोगे जो है अच्छे से जियो और खुश रहो बाय

0
59

हिन्दी भाषा का उद्भव

भारत में प्रमुख रूप से आर्य परिवार एवं द्रविड़ परिवार की भाषाएं बोली जाती हैं। उत्तर भारत की भाषाएं आर्य परिवार तथा दक्षिण भारत की भाषाएं द्रविड परिवार की हैं। उत्तर भारत की आर्य भाषाओं में संस्कृत सबसे प्राचीन है, जिसका प्राचीनतम रूप ऋग्वेद में मिलता है,इसी की उत्तराधिकारिणी हिन्दी है।

भारतीय आर्य भाषाओं के काल को मोटे तौर पर तीन कालखंडों में विभक्त किया गया है-

१. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल- १५०० ई०पू०-५००ई०पू०

२.- मध्य भारतीय आर्य भाषा काल- ५००ई०पू०-१०००ई०पू०

३.- आधुनिक भारतीय आर्य भाषा काल- १०००ई०पू०- अब तक

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा काल में वैदिक संस्कृत एवं लौकिक संस्कृत दो भाषाएं थी। चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, सामवेद) ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद् इसी काल की रचना है, इनमें भाषा का एक रूप नहीं है। ऋग्वेद संस्कृत का प्राचीनतम ग्रन्थ है। लौकिक संस्कृत में रामायण, महाभारत, आदि लिखे गए।इस काल की भाषा योगात्मक थी, शब्दों में धातु रूप सुरक्षित थे, भाषा में संगीतात्मकता थी, पदों का स्थान निश्चित नहीं था। शब्द भंडार में तत्सम शब्दों की प्रचुरता थी।

मध्य भारतीय आर्य भाषा काल में तीन भाषाएं विकसित हुई-

१.- पालि भाषा - ५००ई०पू- १ ई० तक

२.- प्राकृत भाषा - १ ई०- ५०० ई०

३.- अपभ्रंश भाषा - ५०० ई०- १००० ई०

पालि को मागधी भाषा भी कहा जाता है।यह बौद्ध धर्म की भाषा है। बौद्ध साहित्य पालि भाषा में लिखा गया है। त्रिपिटक पालि में लिखे गए हैं- सुत पिटक, विनय पिटक, अभिधम्म पिटक।

प्राकृत भाषा बोलचाल की भाषा होने के कारण पंडितों में प्रचलित नहीं थी। संस्कृत नाटकों के अन्य पात्र इस बोली का प्रयोग करते थे।जैन साहित्य प्राकृत भाषा में लिखा गया है। प्राकृत भाषा के पांच प्रमुख भेद हैं-

१:- शौरसेनी प्राकृत- जो मथुरा या शूरसेन जनपद में बोली जाती थी।इसे मध्य देश की बोली भी कहा गया है।

२:- पैशाची प्राकृत- यह उत्तर-पश्चिम में कश्मीर के आसपास की भाषा थी।

३:- महाराष्ट्री प्राकृत- इसका मूल स्थान महाराष्ट्र था।

४:- अर्द्धमागधी प्राकृत- यह मागधी और शौरसेनी के बीच के क्षेत्र की भाषा थी।

५:- मागधी प्राकृत- यह मगध के आसपास प्रचलित भाषा थी।


अपभ्रंश भाषा का प्रयोग ५०० - १००० ई० तक हुआ।इस भाषा को अवहट्ठ, अवहट, अवहत्थ, देशभाषा, देशी भाषा, आदि अनेक नामों से पुकारा गया। अपभ्रंश का शाब्दिक अर्थ है- बिगड़ा हुआ या गिरा हुआ।जब भाषा का रूप सुसंस्कृत न रहकर बोलचाल का सामान्य रूप हो जाता है, तो पंडितों की दृष्टि में वह भाषा बिगड़ी हुई मानी जाती है,और तब वे उसे अपभ्रंश की संज्ञा देते हैं-

अपभ्रंश भाषा का प्रारंभ कब से हुआ , इस सम्बन्ध में तीन मत है -

१. डॉ. उदयनारायण तिवारी ने अपनी पुस्तक 'हिंदी भाषा का उद्गम और - विकास ' में अपभ्रंश का जन्म काल ७०० ई. स्वीकार किया है |

२. डॉ. नामवर सिंह ने अपने ग्रन्थ 'हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान ' में अपभ्रंश का जन्मकाल ७०० ई. स्वीकार किया है |

३.डॉ. भोलानाथ तिवारी के मतानुसार अपभ्रंश का जन्म ५००ई. के आसपास हुआ है |

अपभ्रंश भाषा का प्रयोग कालिदास के नाटक ' विक्रमोवर्शीय ' में निम्न वर्ग के पात्रों द्वारा किया गया है | छठी शताब्दी के अलान्कारवादी आचार्य भामह ने भी अपभ्रंश का उल्लेख संस्कृत एवं प्राकृत के साथ करते हुए इसे काव्य उपयोगी भाषा बताया है |

अपभ्रंश भाषा का साहित्य में प्रयोग १२०० ई. तक हुआ ,यद्यपि इसका काल ५०० ई.-१००० ई. तक ही मन जाता है | १०० ई. के आसपास हिंदी का प्रयोग साहित्य में प्रारंभ हो चुका था , किन्तु कुछ काल तक बाद में भी अपभ्रंश का प्रयोग साहित्य में होता रहा |

आधुनिक आर्य भाषाओं का विकास इसी अपभ्रंश भाषा से हुआ है | हिंदी का विकास भी अपभ्रंश से ही हुआ है | अतः हिंदी की जननी अपभ्रंश है | उत्तर भारत में अपभ्रंश के सात क्षेत्रीय रूपांतरण प्रचलित थे , जिनसे आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का कालांतर में विकास हुआ |

इनका विवरण निम्नवत है -

अपभ्रंश का क्षेत्रीय रूप विकसित होनेवाली आर्य भाषाएँ

१.शौरसेनी अपभ्रंश पश्चिमी हिंदी ,राजस्थानी ,गुजरती

२.पैशाची अपभ्रंश पंजाबी ,लहंदा

३.ब्राचड़ अपभ्रंश सिन्धी

४.खस अपभ्रंश पहाड़ी

५.महाराष्ट्री अपभ्रंश मराठी

६.अर्धमागधी अपभ्रंश पूर्वी हिंदी

७.मागधी अपभ्रंश बिहारी,उड़िया,बंगला,असमिया

हिंदी एवं अन्य भारतीय आर्य भाषाओं का विकास अपभ्रंश के क्षेत्रीय भेदों से हुआ | इस विवेचन के आधार पर भाषाओं के क्रमिक विकास को निम्न रूप में समझा जा सकता है -

वैदिक संस्कृत >संस्कृत >पाली >प्राकृत >अपभ्रंश >हिंदी एवं अन्य आधुनिक आर्य भाषाएं |

. हिंदी भाषा की उत्पत्ति मूलतः शौरसेनी अपभ्रंश से हुई है |


धन्यवाद

Show more
0
80

विभिन्न आधुनिक लाइफस्टाइल की आदतें जो स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं


लाइफस्टाइल की बात करे तो स्वास्थ एक महत्पूर्ण विषय है आधुनिक जीवन शैली की वजह से हमारे जीवन में काफी बदलाव आये है आधुनिकरण हमारे जीवन को काफी आसान बना दिया है। इन दशकों में, बहुत कुछ बदल चुकी है, आज हम स्मार्टफोन और विभिन्न गैजेट के बिना रहने का सोच भी नही सकते। विभिन्न अविष्कारों की मदद से कई घरेलु काम कुछ पलों में हो जाते है। आधुनिक जीवन शैली का प्रभाव हमारे स्वास्थ पर नकारात्मक रूप में पड़ता है। हमने शारीरिक फिटनेस और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने का समय नहीं है। आधुनिक तकनीक के साथ, लोग आलसी हो गए हैं ।क्योंकि अधिकांश सुविधाएं एक बटन के क्लिक पर उपलब्ध हो जाती हैं। हेल्थी लाइफस्टाइल हमारे जीवन के लिए आवश्यक है, अंहेल्थी लाइफस्टाइल से कई बीमारियों से घिरा होता है जैसे हृदय रोगों, उच्च रक्तचाप और मोटापे में वृद्धि होना। एक स्वस्थ जीवन शैली, जैसे उपयुक्त आहार, शारीरिक फिटनेस स्तर और एक स्वस्थ वजन स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर सकता है आधुनिक जीवनशैली और इसके कारण होने वाला तनाव हमारे शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

कुछ आधुनिक जीवनशैली की आदतें जो स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं

1.अस्वास्थ आहार

आहार जीवन शैली का सबसे महत्वपूर्ण कारक है और इसका स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। आधुनिकरण के कारण हमारे खान-पान में कभी बदलाव आए है। पहले हमारे आहार में विभिन्न प्रकार की सब्जियां और फल हुआ करते थे जो हमारे शरीर को पोषण प्रदान करती थी। तेजी से भागती आधुनिक जीवन में खान-पान का ढंग भी बदल गया है, लोगो के पास खाना पकाने या धीरे खाने का समय नही है। इस कारण लोग फ़ास्ट फ़ूड का सहारा लेते है। इन्ही कारणों से मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप समस्या बढ़ रही है।

2.शारीरिक फिटनेस या व्यायाम की कमी

खान पान की खराब आदतों के साथ , आधुनिक जीवन शैली में शारीरिक फिटनेस की कमी एक महत्वपूर्ण समस्या है। हमारे देश की आधी से ज्यादा आवादी व्यायाम या एक्सरसाइज भी नहीं करती। इसमें महिलाओं की संख्या अधिक है ।आधुनिक जीवन में लोग इतने व्यस्त है की उनके पास व्यायाम या एक्सरसाइज के लिए समय ही नहीं है। जिस कारण ज्यादातर लोग कोई न कोई बीमारियों से ग्रशित होते है।

3. नींद की कमी

नींद की कमी लोगो में एक बड़ी समस्या है। इसमें टेक्नोलॉजी का बड़ा योगदान है जैसे कि टेलीविजन, कंप्यूटर स्क्रीन, लंबे समय तक काम करना,प्रौद्योगिकी की लत और गैजेट्स पर अत्यधिक निर्भरता लोगों को नींद की खराब आदतें पैदा कर रही है। देर तक रहने से व्यक्ति एकाग्रता और ध्यान की कमी को विकसित करता है। स्वास्थ जीवन शैली के लिए, एक व्यक्ति को कम से कम सात घंटे की अच्छी नींद की आवश्यकता होती है।


अगर हमें बीमारियों से दूर रहना है तो हमे हेल्थी लाइफस्टाइल अपना होगे जैसे नियमित रूप से व्यायाम या एक्सरसाइज को अपने जीवन में लाना होगा। पौष्टिक भोजन का सेवन करना होगा । जिससे किसी व्यक्ति को सेहतमंद रखने या उसकी सेहत को सुधारने में सहायक साबित होता है। आज के दौर में, बहुत सारी बीमारियां फैल रही हैं, जिनका समय रहते इलाज न कराया जाए तो यह किसी भी व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। इसलिए सभी लोगों के लिए हेल्थी लाइफ स्टाइल अपनाना काफी जरूरी हो जाता है।


Show more
0
25

Dear frand

Today I introduce my self my name is rupesh kumar

I think I entertain some different type my dear frand I give you some news best trick our life

0
21

0️⃣6️⃣❗0️⃣7️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣1️⃣


*🟣 आज का प्रेरक प्रसंग 🟣*


*!! भला आदमी !!*

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


एक बार एक धनी पुरुष ने एक मंदिर बनवाया | मंदिर में भगवान की पूजा करने के लिए एक पुजारी | मंदिर के खर्च के लिए बहुत सी भूमि, खेत और बगीचे मंदिर के नाम लगाएं | उन्होंने ऐसा प्रबंध किया था कि जो मंदिरों में भूखे, दीन दुखी या साधु-संतों आवे, वे वहां दो-चार दिन ठहर सके और उनको भोजन के लिए भगवान का प्रसाद मंदिर से मिल जाया करे | अब उन्हें एक ऐसे मनुष्य की आवश्यकता हुई जो मंदिर की संपत्ति का प्रबंध करें और मंदिर के सब कामों को ठीक-ठीक चलाता रहे !


बहुत से लोग उस धनी पुरुष के पास आए | वे लोग जानते थे कि यदि मंदिर की व्यवस्था का काम मिल जाए तो वेतन अच्छा मिलेगा | लेकिन उस धनी पुरुष ने सबको लौटा दिया | वह सब से कहता था – ‘ मुझे एक भला आदमी चाहिए, मैं उसको अपने आप छाट लूंगा |’


बहुत से लोग मन ही मन में उस धनी पुरुष को गालियां देते थे | बहुत लोग उसे मूर्ख या पागल बतलाते थे | लेकिन वह धनी पुरुष किसी की बात पर ध्यान नहीं देता था | जब मंदिर के पट खुलते थे और लोग भगवान के दर्शन के लिए आने लगते थे तब वह धनी पुरुष अपने मकान की छत पर बैठकर मंदिर में आने वाले लोगों को चुपचाप देखता रहता था |


एक दिन में एक मनुष्य मंदिर में दर्शन करने आया | उसके कपड़े मैले और फटे हुए थे वह बहुत पढ़ा लिखा भी नहीं जान पड़ता था | जब वह भगवान का दर्शन करके जाने लगा तब धनीपुर उसने अपने पास बुलाया और कहा – ‘ क्या आप इस मंदिर की व्यवस्था संभालने का काम करेंगे ?’

वह मनुष्य बड़े आश्चर्य में पड़ गया | उसने कहा – ‘मैं तो बहुत पढ़ा लिखा नहीं हूं मैं इतने बड़े मंदिर का प्रबंध कैसे कर सकूंगा ?’


धनी पुरुष ने कहा – ‘मुझे बहुत विद्वान नहीं चाहिए मैं तो एक भले आदमी को मंदिर का प्रबंधक बनाना चाहता हूं |’


उस मनुष्य ने कहा – ‘आपने इतने मनुष्य में मुझे ही क्यों भला आदमी माना |’


धनी पुरुष बोला – ‘मैं जानता हूं कि आप भले आदमी हैं | मंदिर के रास्ते में एक ईंट का टुकड़ा गड़ा रह गया था और उसका एक कौना ऊपर निकला था मैं उधर से बहुत दिनों से देख रहा था कि उस मंदिर के टुकड़े की नोक से लोगों को ठोकर लगती थी लोग गिरते थे लुढ़कते थे और उठ कर चलते थे | आपको उस टुकड़े से ठोकर नहीं लगी किंतु आपने उसे देख कर ही उखाड़ देने का यतन किया मैं देख रहा था कि आप मेरे मजदूर से फावड़ा मांगकर ले गए और उस टुकड़े को खोदकर आपने वहां की भूमि भी बराबर कर दी |’


उस मनुष्य ने कहा – “यह तो कोई बात नहीं है रास्ते में पड़े कांटे, कंकड़ और पत्थर लगने योग्य पत्थर, ईटों को हटा देना तो प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है |’


धनी पुरुष ने कहा – ‘अपने कर्तव्यों को जानने और पालन करने वाले लोग ही भले आदमी होते हैं |’


वह मनुष्य मंदिर का प्रबंधक बन गया उसने मंदिर का बड़ा सुंदर प्रबंध किया |


*शिक्षा:-*

"मित्रों! “हर मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए..!!"


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️

Show more
0
21

कविता


एक एहसास है, जिससे मैं बाहर निकलना चाहती हूँ ,

मेरे अंदर एक डर है, उस डर का लिबास उतार कर, अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ना चाहती हूँ ,

औरत हूँ, बेचारी हूँ, मैं कुछ करना चाहती हूँ ,

अकेले बदल नहीं सकती दस्तूर -ए -दुनिया, जानती हूँ ,

पर, बदलाव की इस लड़ाई में, मैं अपनी हस्ताक्षर करना चाहती हूँ ,

औरत की औरत के प्रति सोच बदलना चाहती हूँ ,

परिंदों कि तरह खुले आसमान में उड़ना चाहती हूँ , मै कुछ करना चाहती हूँ ,

अकेले तोड़ नहीं सकती समाज की बेड़ियाँ, जानती हूँ ,

पर, शिक्षा की लौ जलाकर अन्धकार को कम करना चाहती हूँ ,

खुद के पैरों पर खड़े होकर, विकृत मानसिकता पर, एक तमाचा जड़ना चाहती हूँ , मै कुछ करना चाहती हूँ ,

अकेले बदल नहीं सकती पुरुषों की मानसिकता , जानती हूँ ,

औरत को भोग की वस्तु समझने वालों का नजरिया बदलना चाहती हूँ ,

अपने लिए सजना और संवरना चाहती हूँ ,

मैं कुछ करना चाहती हूँ ,

अकेले टिक नहीं सकती तूफानों से , जानती हूँ ,

निभा रही हूँ फ़र्ज़, अपने अधिकारों की रक्षा करना चाहती हूँ ,

फिर भी खुद अपनी पतवार बन, लहरों से लड़ना चाहती हूँ ,

औरत हूँ, औरत ही रहना चाहती हूँ , मैं कुछ करना चाहती हूँ ,

समाज में फैली कुरीतियों को बदलना चाहती हूँ ,

अपने लिए तो सभी जीते हैं, मैं सबके लिए जीना चाहती हूँ ,

नहीं चाहती शोर मचाना,

मैं तो मन में समा कर मन बदलना चाहती हूँ ,

मैं कुछ करना चाहती हूँ ...


Show more
0
83
https://avalanches.com/in/ranchi__alsafahat_is_the_the_top_brand_for_organic_skincare_and_hair_care_in1167000_29_12_2020

People have started thinking differently. Fathers want their daughters to become employed to be secure in life, rather than marrying a rich man for security. Even the homemakers are trying to do something on their own to make their identity.

Ayeesha Aquib, a housewife and mother of two sons wanted to do something for herself and started an organic skincare and haircare brand which is home-based. Al-Safahat is the name of her brand. Ayeesha Aquib has exclusively prepared the products of Al-Safahat organically using natural ingredients. The first product of this organic skincare and haircare brand Al-Safahat is the Saffron gel, and gradually it became one of the best selling products.


In 2018, Ayeesha Aquib decided to come out of her comfort zone, and do something good for others. She chose to use the natural Karishma of Mother Earth and started this organic skincare and haircare brand Al-Safahat. She used to struggle while choosing the perfect solution for skin care and hair care problems without facing the long-term side effects of the harsh chemical-based formulas.


Al-Safahat can be used by kids and adults. The products can be used irrespective of gender. The organic Saffron Gel of Al-Safahat consists of Vitamin E, Saffron, essential oils, and Glycerin. Vitamin E is very necessary to include in a daily skincare routine to reduce the aging problem and lock the age of the skin. The combination of Saffron, Vitamin E, and essential oils works amazingly to lighten unwanted acne scars and dark spots. The organic Saffron Gel of Al-Safahat has become a compulsory product of the night skincare routine of many customers, as it helped them to get rid of those scary nightmares.


After getting an overwhelming response from the happy customers who used the Saffron Gel, Ayeesha Aquib launched several new products of Al-Safahat. The products are all organic and cruelty–free. Their newly launched organic skincare and hair care products included the 24k Gold Elixir, Eye roll-on, Luxurious Hail Oil, Acne Face Mask, Baby Massage Oil with Saffron, Lip Scrubs in three different Variants, Cucumber Fairness Day Cream, Anti Acne Gel, Oats and Saffron Face Pack, Calamine Face Pack, Bridal Glow oil, and Glow and Shine Ubtan. All these products were launched in July 2018.

By the end of 2019, Ayeesha Aquib launched 11 gels and creams, 5 serums, 7 face packs, 4 face scrubs, and the best-selling face wash along with other several products of Al-Safahat. After the organic saffron Gel, Aqua Pearl Serum became their next best selling during the winter season of 2018.


In 2020, when all the businesses were going down, Ayeesha Aquib’s Al-Safahat gained many customers from distant parts of India. They made their ground stronger by organizing various giveaways and quarantine combo pack offers.


Al-Safahat has launched its new website in November 2020, with a complete hair care package for adults. During the winters most of us face hair fall problems and dandruff issues, Ayeesha Aquib has solved this problem permanently and organically-Safahat has launched their new website, www.al-Safahat.com in November 2020, with their new launch, ‘The Complete Hair Care’ package for adults.

Show more
0
115

Islam for girLs?

I have a question for all muslim boys and men..aaplog azan k waqt ldkiyon ko sr pe dupatta rakhne ko kehte ho..thik hai achhi baat h bilkul rakhni chahie lkin aap ye btao kya apko v sr dhakna nai chahie???

Kya quran me aisa likha h k sirf ladkiyon ko hi sr dhakne ka hukm hai ladkon ko nahi???


Show more
0
25

The Seaweed resources in India – prospects and challenges

Introduction

I

n 2019–20, India produced over 325 million tons of food grains to feed more than 1.4 billion people. This population is increasing every year. As it grows, demand for food grain production increases. Traditional Indian agriculture is currently at maximum production levels but lacks the capacity to fill the gap between production and demand. The farmlands are further put to more lucrative uses of land for building townships, industrial corridors, commercial establishments, infrastructural facilities etc. Therefore, it is imperative that society must identify alternative resources that will support and supplement the long-term human food demands sustainably with minimal environmental impacts. There is ample evidence of the importance of seaweeds in the context of human food needs and ecological benefits of farming. Economic uses of seaweeds particularly for food, feed, phycocolloids and agro-based products, are well known for centuries and are now being extensively investigated for their application in bio-fuel, neutraceutical, medicinal, personal-care and food additive industries. Direct consumption of seaweeds as food in the form of salads, soups and a number of other food preparations is very common in Southeast Asian countries. Japan, China and Korea stand at the forefront of seaweed utilization in human food preparations, whereas in India, seaweeds are used only for the extraction of industrially important phycocolloids such as agar, alginate and carrageenan.

Global production of seaweeds has been estimated at 30.1 million wet tons in 2016, with 95% of the total produced from culture and the remaining 5% from natural beds. The top seven countries that account for global production of seaweeds are: China, Japan, Korea, Indonesia, Philippines, Malaysia and Vietnam. However, in India, agar and alginate are produced from seaweeds harvested from wild stocks. The present review provides an overview of Indian seaweed resources, their utilization and the associated seaweed industry. Recent initiatives to develop and transform seaweed farming into social enterprises are described. Opportunities and challenges for building a successful seaweed industry in India are also discussed.

Seaweed diversity

India is among the 12 mega-biodiversity nations in the world. India’s coastline is 8100 km long and has an Exclusive Economic Zone (EEZ) of 2.17 million km2 (equal to 66% of total mainland area). Nearly 30% of its human population is, one way or another, dependent on the rich exploitable coastal and marine resources. The Indian coastline, with its different coastal ecosystems, supports luxuriant growth of diverse seaweed populations, having considerable economic importance.



Phycocolloid production


Agar

Indian agar production started in 1940 on a cottage-industry scale. Later, a process for industrial manufacture of agar was developed. With the development of the industrial methods, a few processors started agar production This food-grade agar meets most domestic Indian requirements. Food grade agar powder fetches higher prices than agar strips.

Alginate

Alginate is extracted from wild stocks along the Gulf of Mannar coast. Alginate production has steadily increased from 98 metric tons in 2003–200 metric tons in 2016. SNAP Natural Products and Alginate (P) Ltd. is the major producer. SNAP produces a variety of alginate products, including food, pharmacological, industrial, textile and welding grades. Alginates have been used in a wide range of applications as thickening and gelling agents in the food and feed processing industries. Pharmaceutical industrial concerns utilize alginate coloring agent as stabilizers and in the textile industry as water proofing, paper coating and in wastewater treatment.



Seaweed culture

The Southeast Indian coast is considered to be most suitable for commercial seaweed cultivation because it has shallow, wide and flat coastal shorelines with moderate wave action, and rich in nutrients including phosphorus and nitrogen. Seawater salinities and temperatures are optimal for seaweed production making the region suitable for commercial seaweed cultivation year round, except during the monsoon season. Essential cultivation supplies including bamboo, rope and anchors are readily available at reasonable prices close to the cultivation sites.


Economics of seaweed cultivation

The bamboo raft system is the preferred method for all industrially valuable Indian seaweeds. Advantages include: raft located in sub-surface seawater column providing adequate sunlight exposure; rafts are easily handled and relocated to suitable locations free from epiphytes and grazing; and bottom nets minimize herbivore grazing of algae. Materials for making rafts (e.g. bamboo, anchor stones, polypropylene rope, etc.) are commonly available close to the farm areas.



Future directions in seaweed culture in India

Indian seaweed cultivation dates back nearly four decades. Cultivation technologies have been developed for several industrially valuable seaweeds over the last 20 years but there are still many challenges to overcome. Challenges include the need for high-temperature-tolerant and fouling- and disease-resistant strains. Most Indian seaweed cultivation is located in near-shore waters, and to overcome inshore challenges an alternative farming strategy including expanding to offshore culture systems is recommended.


Offshore cultivation

Indian seaweed cultivation in near-shore areas faces several challenges. Expansion of cultivation grounds is a major constraint due to water use conflicts with fish landing centers and commercial fishing activities. Human sewage rich in phosphate and nitrate from major municipalities and small towns has negative impacts on seaweed growth. Run-off from land-based agriculture, thermal power plants and chemical factories inundates near-shore waters and contributes to commercial cultivation challenges. Shallow, near-shore seawater temperatures often reach levels that inhibit seaweed growth. These challenges represent contributing reasons to relocate seaweed cultivation operations to offshore sites. Offshore seaweed cultivation has several potential advantages including: elimination of space limitation as vast ocean areas are available; water use conflicts are minimized due to minimal fishing activities; and offshore waters are clean and transparent as agricultural runoff, sewage and industrialized discharges are minimized due to open ocean dispersion. Offshore algal farming has potential disadvantages including: maximum wave height of 5–10 m; current velocity of 2–3 knots; and wind speeds of 35 m s−1 all of which can damage and dislodge the farm infrastructure. Offshore farming units must be able to withstand these dynamic conditions. The development of novel, offshore seaweed farms could play a major role in generating sustainable energy from biomass. Use of special textile mats can simplify seaweed farming and substantially increase yields. .


Biofuel production from seaweeds

Seaweeds are appealing potential biofuel feedstock candidates for the production of transportation fuel, as they grow rapidly and exhibit high photosynthetic light harvesting efficiency. Globally, several countries including India have reported efficient conversion of macroalgae to biofuels such as bioethanol, biobutanol, biomethane and biohydrogen. Potential Indian seaweed genera for biofuel production in India include Ulva, Kappaphycus, Gracilaria, Gelidium, Sargassum, etc. Red algal genera including Kappaphycus, Gracilaria and Gelidium have been cultivated in India for phycocolloid production. Due to their potential for large-scale farming, these seaweeds have been examined for their biofuel production potential, utilizing their phycocolloid or cellulose content as substrates. Recently, green seaweeds, mainly Ulva sp., have also emerged as potential feedstock for biofuel production due to their high carbohydrate content, higher growth rates and lack of direct commercial utilization. Several research groups in India are actively working on the growth engineering of seaweeds, bio-refinery techniques for extraction of value-added products and photo-bioreactor design for high biomass production. Biofuel production from residual biomass after extraction of value-added bio-products from seaweeds makes the process economically viable from an industrial perspective.



Opportunities and challenges for establishing successful seaweed industries in India

Opportunities

Bio-fertilizer and bio-stimulants from seaweeds have immense potential in the Indian agriculture sector. Seaweed bio-stimulants increase crop yields and quality, reduce use of chemical fertilizers and help improve the soil fertility. India imports seaweed bio-stimulants worth US $25–30 million annually from Canada, Norway, Indonesia, Philippines and China. There are opportunities to promote indigenous sea weed-based technology for the production of bio-stimulants. Promoting indigenous seaweeds for bio-stimulants will reduce the fertilizer subsidy burden of the Indian exchequer.

Seaweeds have the potential to be used in a broad spectrum of products such as: food, biofuels, chemicals, cosmetics, medicines, etc. The National Bio-fuel Policy of India (2018) targeted 20% blending of biofuels by 2030. It is estimated that, if 460 million tons of fresh seaweed biomass per year could be harvested from a 10 million hectare area (corresponding to about 5% of total EEZ of India), it could generate 6.66 billion liters of bioethanol, which would meet the targeted petrol blending by 2030 in India. Industrial production of biofuel from seaweeds needs to be given top priority.

India’s traditional food practices are different from other Asian seaweed consuming nations. Although 30% of the Indian population lives close to the sea, people are not accustomed to eating seaweed. Formulation of a wide variety of recipes by food technology institutes for adaptation to Indian palates and popularization through social media are needed for promoting seaweed-based foods in India. International collaboration for processing and preparation of seaweed-based foods should be established with the Southeast Asian countries where consumption of seaweed food is popular.

Seaweeds have tremendous business potential for generating revenue and jobs in bioactive and cosmetic sectors as they possess anti-ageing, anti-oxidant and moisturizing properties. However, such applications are not yet developed at the industrial level in India and so an initiative to do so needs to be given priority. Seaweeds with high pharmaceutical and cosmetic applications need to be identified and cultivated at large scale through industrial collaborations. Identifying suitable cultivable and scalable seaweed strains for pharmaceutical and cosmetic applications should be undertaken by an industrial public-sector collaboration.


Challenges

Several cultivation technologies have been developed through significant Indian research and development efforts, and commercial seaweed farming is being carried out using floating rafts along the southeast coast of India. Such structures are suitable for near-shore waters where low tidal amplitude and minimal tidal influences persist. However, a major portion of the Indian coastline is exposed to the open sea and has high tidal amplitudes. Recently, Tube net method has successfully been developed on the Gujarat coast. Tube-net systems withstand rough sea conditions while producing good biomass yields. Several other culture systems which can withstand high water dynamics in open water areas needs to be developed. Seasonal dependency on Indian seaweed culture represents a crucial challenge needing to be overcome. Monsoon periods in India are associated with occasional occurrence of cyclones and typhoons and create high seawater turbulence and high tidal fluctuations. Cultivation during this period is restricted to seed bank preservation. Land-based cultivation in intensively operated ponds has been done successfully for several species. In India, seaweeds are mainly used for extracting phycocolloids and the high cost of pond-produced seaweeds may not be profitable unless the harvested seaweeds are processed for multiple products e.g. biofuel, bio-stimulants, food, cosmetics and pharmaceuticals Seaweed growers are receiving minimal prices for their harvested seaweeds due to their sale to cottage-level industries for indigenous phycocolloid extraction. Export of dry seaweeds has been banned for several decades. If the ban is lifted and export of dry seaweeds is permitted, farmers will realize higher prices for their seaweeds. Other challenges in seaweed farming affecting crop productivity and quality are crop health issues such as high temperature impacts, diseases which rely on R&D efforts to reduce or eliminate.


Show more
0
17
https://avalanches.com/in/ranchi_he_need_stability_in_his_cricket_career_dhoni1040721_22_11_2020

Former Indian Skipper Ms Dhoni Exclusive Interview to Times of Indian Sports .

MS Dhoni said “I am just a aggressive Wicketkeeper batman and i saw my mirror impact on Sanju Samson and Shantanu Bhardwaj, if team management and people supporting them they would be better than me”

Reporter asked “MS why you always back Shantanu Bhardwaj even he is not popular as Public Figure? and will you play IPL 2021 or take unpredicted retirement ???

MS Dhoni said “ That the most precious thing, Shantanu Bhardwaj have never publicized him self lives in shell and served his performance quite well and I proud of him”, “Shantanu always lives like a simple boy that never change if he fail or succeed in any thing.He only need stability in his career


Show more
0
163
https://avalanches.com/in/ranchi_karnataka_updates1002786_11_11_2020

Karnataka Updates

Karnataka: In Karnataka as we know colleges are going to open from 17 Nov. 2020,the colleges are going to conduct internal exams for students. The test is going to be held offline. But for those who are not in Karnataka they have to give test online.

0
21
https://avalanches.com/in/ranchi_one_of_the_youngest_writer_publishes_his_first_book_yesterday912806_16_10_2020
https://avalanches.com/in/ranchi_one_of_the_youngest_writer_publishes_his_first_book_yesterday912806_16_10_2020

One of the youngest writers published his first book yesterday.


Dibyanshu Kumar and Bhumika Bhumi who were working together on a book , published it yesterday. Dibyanshu Kumar nominates himself in the list of Youngest writers from India and all over the world.

The book is based on one of the characters of MAHABHARATA

An Indian Mythology. Both of them with the help of some enlightened persons, worked on this book for over a month and now it's finally published.


You can buy the book from:

https://amzn.to/346Ya93 or https://bit.ly/3j2mJbj

Show more
0
60
Other News India