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निजता का संस्कृतिकरण-भारतीय महिला

विशेषांक -अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

महिला दिवस प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है और इस दिवस के मनाये जाने के पीछे जो एक गहरा दर्द विक्षोभ छिपा है,को जानना आज बेहद जरूरी और प्रासङ्गिक भी हो जाता है.

परिभाषित करने वालों ने महिलाओं को उनके चारित्रिक गुणों व विभिन्न अवस्था एंव चरण हैं.जिसमें सबसे महत्वपूर्ण इकाई के रूप में ‘माँ’ का चित्रांकन करना भारतीय समाज के नैतिक शिक्षा व मूल्यों पर अधिक बल प्रदान करता है और यह व्यक्ति विशेष को सभ्य एंव संस्कृत की ओर नित् आगे बढ़ने को तत्पर करता है.

भारत में समाज के विभिन्न चरणों में पुरूषों के पितृसत्तात्मक पक्ष पर अधिक झुकाव,बल और पक्षपात के कारण एकतरफा विकास से इकीसवीं सदी तक इनके सम्पूर्ण विकास व संवृद्धि को लेकर संविधानिक जवाबदेही बनी रहेगी. दो धुरियों के समान गतिविधियों से ही आवेग प्रवृति सकारात्मक ऊर्जा व परिणाम प्राप्त कर सकता है ये बात हम सभी आज जान चुके है फलतः इस दिशा में एक कदम सफलता की ओर नत ‘कदम से कदम’ और ‘ कंधे से कंधे’ मिलाकर मौलिक अधिकारों व पक्षपाती रवैया को शने:शने कम करने की ओर आहूत हो,ऐसी मनःस्थिति के साथ बिना किसी लैंगिक असमानता के साथ आगे बढ़ रहे है. हालांकि कुछ एक बेड़ियाँ जो अब भी पारंपरिक सामाजिक ढाँचे को तोड़ने में कमजोर पड़ रहा,उन्हें सही शिक्षा,शैक्षणिक गतिविधियों व सामाजिक कौशलता से दूर करने का बीड़ा हमसब को एकसमान रूप से उठाना ही होगा,तभी हम महिलाओं को सशक्त,सबल और स्वावलंबी बना सकते है,अन्यथा महिलाएं अपने हक और सम्मान की लड़ाई एकतरफा लड़ती रहेगी.

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए भले ही व्यक्ति का व्यक्तित्व विकास उनका एकमात्र चयन हो परंतु समुचित विकास “सबका साथ” से ही सफल हो सकता है.

आज का समाज सिर्फ आज यानी वर्तमान को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ रहा है,जो एक मद में व्यक्तिगत तौर पर ठीक हो सकता है परंतु यह सामूहिक रूप से कभी हितकर नहीं. हम सभी में दूरदर्शिता की कमी से भौतिक सुखों की तो प्राप्ति कर लेते है परंतु सार्वभौम रूप से समाज,सभ्यता और संस्कृति के बारे में विशेष संज्ञान नहीं ले पाते,फलतः एक व्यापकता की बड़ी कमी खलने लगती है,जहाँ विचारों में तुच्छता नज़र आना लाज़िमी हो जाता है और समय व परिस्थितियों के कारण धुर्तपना ज्यादा बढ़ जाती है जो सकारात्मक पटल का निर्माण नहीं कर रहा होता और यह सभी तरह के रिश्ते,आचरण एंव सद् विचारों को नष्ट कर की शक्ति निहित कर लेता है.

एक पुरूष में मातृत्व संस्कार(मेटरनिटी कल्चर) का पाया जाना एक माँ के लिए,बहन के लिए या किसी भी रिश्ते को नैसर्गिक तक ले जाने के लिए ठीक उतना ही जरूरी और आवश्यक है जितना कि एक माँ के लिए वात्सल्यमयी होना। नैसर्गिक में निजता है परन्तु यह सामाजिक संस्कार में ढलने के बाद स्वतः ही करुणा,दया,संवेदना आदि का समावेश कर देता है जो कि हमें या किसी भी जीव में माँ के दूध से प्राप्त होता है.

एक महिला के अंदर पैतृक संस्कार का पाया जाना उन्हें पुरुषों की तरह ताकत,साहस,आत्मबल प्रदान करता है. उदाहरण के रूप में “वो जून की तपती धूप में पत्थर तोड़ती महिला” से “रानी लक्ष्मी बाई” तक का सफर अदम्य वीरता और साहस का परिचय देता है. इसी तरह के अनेकानेक उद्धरण है जो महिलाओं को किसी पुरूष से कम नहीं आँकती. चाहे वह कल्पना चावला जैसी अंतरिक्ष यात्री हो या एक बड़े ओहदे पर पद धारण की हुई कोई महिला.

इन सबके बावजूद भी वह किसी की माँ ,बेटी, बहन होने का पूरा उत्तरदायित्व निर्वहन कर रही होती है,के उपरांत भी हमारा पुरुषवादी सोच उन्हें चार दीवारी के भीतर जकड़ कर रखना पसंद करता है,यह तुच्छता नहीं तो और क्या है. क्या ऐसे समाज से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह आने वाले समय तक अपने विचारधाराओं में परिवर्तन कर पाएगा.यह सवाल उनसभी नवचिंतको के लिए भी है जो अपने आंखों से वर्तमान में महिलाओं के साथ हो रहें संघर्षों को कमतर समझने की भूल करता है या उन्हें दबाने के लिए शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देता है.

हमें इस स्टीरियोटाइप माइंडसेट या ऑथोडोक्स विचारधारा को बदलना अविलंब जरूरी है ताकि बच्चे के साथ आने वाले भविष्य में नकारात्मक ऊर्जा व प्रभाव से बचाया जा सके। साथ ही शैक्षणिक संस्थानों को भी इस बदलते स्वरूप को अलग ढंग से देखने की जरूरत है.


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