के सभी प्रकाशन IN-45052 . पटना , भारत

Publications

सर्दी की मौसम में सुना है शामें रंगीन होती है,

जुकाम हो जाता है, तो क्या हुआ,

दिन बेहतरीन होती हैं।

जाड लगता है जब बारिश होती है तब,

फिर भी रंजिशें युँ ही कटती रहती हैं शामें,

जाने क्यूँ मेरे लिए हम राज रोके रखी है, गुलबान तलक।

रहमें करम सबुत के घेरो में,

ढल जाता है तनिष्क फिरौती का,

डुब गया हूँ शामों में कठिनाई और शराफ़त की नजाकत में।

साँसों में आॅक्सीजन की जगह कार्बन जा रही, सोंचो क्युँ ऐसी ही रश्म हैं जीवन की डोरी का।

शबनम फुल बनकर तराशी गई पन्नें,

जा रही है हाथों से युँ प्यादा तो नहीं कबाबों का।

सादगी उमड रही है,

शाम ढल रही है,

क्या एकता यही है हमारी दिल्लगी का।

एक शराबी भी शराब पी प्याला छोड जाता है,

तनिक समझो बिना ताबिज के कोई इतना क्युँ इठलाता है।

दुबक जाओ सर्द हवा है,

कहीं ठंढ न लग जाए,

आई है रूख मोडकर ये बीमारी दिल की, कहीं किसी मोड पर बैवजह बदनाम न कर जाए।

Show more
0
33

*❤️❤️अपनी-अपनी*❤️❤️

✍?हाथ है अपने अपनी सोंच है,

जिन्दगानी की कुछ अपनी ही सोंच है।

पता नहीं मुझे कहाँ ले जाएगी मुझे मेरी कशिश,

फिर भी लिखता हूँ, एक उम्मीद है।

कहते हैं सरफरोश होते हैं ज्जबाती होते हैं, सबकी अपनी अपनी गमोंखुश की हरजाई होती है।

लिखना तो कोई गुनाह नहीं,

सोंच के आँखें नम होती है।

मैंने खोजा है अवकाश में!

काश वो हमारा हो

जग जानता है हमें हमारे नियम को,

फिर कोई क्यों कहे ये तुम्हारा नहीं हमारा है।

निश्छल निर्मल है प्रकृति मेरी,

फिर भी लांछन लग जाते है।

खुद के द्वारा तैयार की गई मेरी अपनी लेख को क्युँ कोई अपना कह लेते, क्यों कोई अपना कह लेते हैं।

पढता हुँ कई पन्नों को मैं, फिर कहीं जाकर मात्र एक पन्ना ही लिख पाता हूँ मैं ।

कशुर मेरी समझ की है, मेरे दोस्त !

हो सकता है, इतना ही सीख पाता हूँ मैं।

Show more
0
33
Show more